एक सॉफ्टवेर इंजिनियर ने किया ऐसा काम जो बन गया सबके लिए मिसाल

दो दिन का किसान, पांच दिन सॉफ्टवेयर इंजिनियर

बंगलुरु। सॉफ्टवेयर इंजीनियर और करता है खेती, यह बात सुनने मे अचंभित जरूर करती है लेकिन माटी से जुडे रहने की चाह और प्राकृतिक खेती के तरीकों को बढ़ावा देने का जुनून महेश का दो दिन का किसान बना देता है। खेती मे जैविक तरीकों का प्रयोग कर महेश न सिर्फ अधिक मुनाफा कमा रहे हैं बल्कि और किसानों को भी नयी राह दिखा रहे हैं। वहीं महेश उन लोगों के लिये भी प्रेरणा हैं जो गांव छोड़ शहरों में ही विकास के अवसरों को देखते हैं और अपनी जड़ों से दूर हो जाते हैं।

माटी को बचाने का जुनून

बेंगलुरु के कॉग्निजेंट टेक्नोलॉजीज में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर कार्यरत महेश कावलगा वीकेंड में कर्नाटक के गुलबर्गा जिले में अपने गांव जाकर दो दिन खेती करते हैं। महेश का कहना है कि उनके गांव में किसान खेती के लिये रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं जिससे गांव की उपजाऊ मिट्टी बंजर बनती जा रही है। इसमें बदलाव लाना जरूरी था इसलिये मैने गांव की मिट्टी के लिये कुछ करने की ठान ली। गांव में 40 एकड़ की पैतृक जमीन थी जिसपर अप्रैल 2016 में मैने जैविक तरीकों से खेती करना शुरू कर दिया। हालांकि यह इतना आसान नहीं था। क्योंकि खुद का करियर सुरक्षित रखने के लिये नौकरी भी नहीं छोड़ी जा सकती थी। वहीं खेती के लिये एक तालाब, गोदाम और गोशाला निर्माण के लिये भी पैसे की आवश्यकता थी। ऐसे में पिताÑ, परिवार और बीज मनुष्य के नाम से जाने जाते श्री रघुवंशी का सहयोग मिला तो राह आसान हो गयी। खेते में ही एक तालाब खुदवाया और दो साथी भी सहयोग के लिये रख लिये।

खेत में उगाते हैं तीस तरह की फसलें

बकौल महेश आज उनके खेत में तीस किस्म की फसल उगायीं जाती है। सौ प्रतिशत आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को लेकर चल रहे महेश का प्रयास है कि खेती के लिये बाजार से कुछ भी न खरीदा जाये। उनका मानना है कि ज्यादातर खेती बाजार से मिलने वाले सामान पर निर्भर है जिससे खेती का खर्च बढ़ जाता है और किसान को कर्ज और कम मुनाफे की परेशानी का सामना करना पड़ता है।

गांव में पानी की समस्या को देखते हुए महेश ने खेत में एक तालाब भी खुदवाया है। आज उनके पास खिलारी, देवनी और जावरी नस्लों की देसी गायें हैं। महेश का कहना है कि खेती में इंटरक्रॉपिंग का प्रयोग करने से मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है और जमीन के पोषक तत्व भी नष्ट नहीं होते। महेश खेती से लेकर फसल बिक्री तक में बदलाव लाने की वकालत करते हैं। उनका कहना है कि किसान को अपने उत्पाद स्थानीय मंडी में बेचने की बजाये खेत में बेचना चाहिये ताकि उन्हें बिचौलियों के उत्पीड़न का शिकार न होना पड़े और वह अधिक लाभ प्राप्त कर सकें।

खेती को रसायनों से मुक्त करना लक्ष्य

जैविक खेती को अपना जुनून बना चुके महेश का लक्ष्य है कि किसानों को प्राकृतिक खेती के तरीके अपनाने को प्रेरित किया जाये। महेश का कहना है कि वह अपने जिला गुलबर्गा को 2025 तक रसायनमुक्त और आत्मनिर्भर खेती करने में सक्षम बनाने के प्रयास कर रहे हैं। इसमे लोगों का सहयोग मिल रहा है और वह भी जैविक खेती के तरीके अपनाने लगे हैं।

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