13 HIV पीड़ित बच्चों के प्यारे पिता हैं मेरठ के अजय शर्मा

अजय शर्मा वह व्यक्ति हैं जिन्होंने एक ऐसा उद्देश्य, जिसके बारे में बहुत कम ही लोग सोच सकते हैं, उसे चुनकर अपनी जीवन यात्रा को जीवंत बनाया है. वह वो हैं जिन्होंने 13 बच्चों को गोद लिया है, जोकि सभी एचआईवी पॉजीटिव हैं.

वह सरकारी इंटर कॉलेज, फलवाड़ा में नौकरी करते थे जब 2004 में उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ और 15 दिनों के लिए वह कोमा में चले गए. भगवान की कृपा से वह सामान्य जीवन में लौटकर, घटना से उभरे और तब से समाज को समर्पित उद्देय के लिए कार्य करने हेतु प्रोत्साहित हुए.

2008 में, उन्हें एक एचआईवी पॉजीटिव अनाथ बच्चे के बारे में पता चला जिसके रिश्तेदारों ने उसे मारकर, उसके शरीर को एक सूटकेस में बंद करके एक ट्रेन में छोड़ दिया था. इस हृदय विदारक घटना ने अजय में ऐसे बच्चों के लिए कार्य करने के लिए एक जुनून पैदा कर दिया. इसे एक पूर्णकालिक उद्देश्य के रूप में अपनाने के लिए, उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और इसके बदले में बस्ती के बच्चों को पढ़ाना शुरु किया. 2008 में, शर्मा एक एचआईवी पॉजीटिव लड़के के संपर्क में आए जिसे उसके परिवार द्वारा बेसहारा छोड़ दिया गया था और किसी की सहायता न मिलने के कारन वह खत्म होने वाला था.

अजय उस बच्चे को कई अस्पतालों में ले गए किंतु कोई भी उसे भर्ती करने के लिए तैयार नहीं था. अंत में, वह उस लड़के को अपने घर ले आए और उसकी अच्छी तरह देखभाल की. लड़के को पुन: जीवन मिल गया और साथ ही एक घर भी. फिर अजय शर्मा ने 2008 में सत्यकाम मानव सेवा समिति (SMSS) की स्थापना की जहाँ एड्स/एचआईवी के कारण ऐसे त्यागे गए लड़कों को घर के वातावरण में रखा जाता है. अजय में जीवित रहने की दृढ़ इच्छाशक्ति है जिसे वह एड्स/एचआईवी के प्रभावित उनके 13 गोद लिए बच्चों में भी डालना चाहते हैं.

उनके उद्देश्य को नैतिक और आर्थिक रूप से उनकी पत्नी बबीता द्वारा सहायता दी जाती है. कई बार, सत्यकाम गृह के किराए का आवास – इन बच्चों के लिए आवासीय गृह की देखभाल उनकी पत्नी के वेतन के माध्यम से की जाती है, आमतौर पर व्यक्तिगत खर्चों और इच्छाओं को कम करके क्योंकि वे दोनों अनुभव करते हैं कि इन बच्चों के लिए इस आवास की अनुपस्थिति में, वे प्रेम, स्नेह और सुरक्षा को खो देंगे.

वर्तमान में अजय शर्मा आगे आकर नागरिकों के साथ इस बीमारी पर जागरूकता फैलाने के लिए यह समझाते हुए कार्य कर रहे हैं कि यह बीमारी छूने से नहीं फैलती है और सत्यकाम इसका सबसे बेहतर और सच्चा उदाहरण है. इस गृह के माध्यम से ये सभी बच्चे अपनेपन का अनुभव करते हैं.

गृह में सबसे छोटे बच्चे की उम्र 5 है और उनमें से प्रत्येक बच्चा अजय को ‘पिताजी’ कहकर बुलाता है. अजय इस चुनौतीपूर्ण कार्य में तत्पर हैं तथा कई और के ‘पिता’ बनना चाहते हैं. अपने अविचल प्रेम के कारण, सभी बच्चों का कहना है कि वह हमेशा अपने पिता ‘अजय’ के साथ रहेंगे.

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© 2015 by NGO Aid India.

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