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ngoaidindia
Jul 24, 2017

Meerut NGO sends sanitary pads to Modi to protest 12% GST

1 comment

Edited: Mar 31

 

Protesting against the 12% Goods and Services Tax (GST) imposed on sanitary napkins, a Meerut-based NGO, Progressive Women Welfare Association, sent a packet of the products to Prime Minister Narendra Modi on Monday. The members of the NGO said that a sanitary napkin is an essential item for any woman between 12 and 55 years of age and it was “insensitive” of the government to put a tax on it.

 

Pooja Singh, secretary of the NGO, said, “A majority of the women in India are unable to afford sanitary napkins because of the cost. This is when it is a necessity for them and concerns both sanitation and menstrual health of a woman. By imposing 12% GST on sanitary napkins, the government has tried to make a mockery of women.”

 

#WASH #Meerut #Inspiring #Story

nazeerknl757
Nov 14, 2017

My Name Is Nazeer Ahamed from Kurnool Dist of Andhra Pradesh . Our Oganization Victory Educational and Welfare Society , So we are ready to Work CSR programme in our Area . If Dona rs support for established shelter , to Mental retired person by Road side. My mobile 9849066757

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  • ngoaidindia
    Apr 2

    ज़्यादातर बच्चे अपने बचपन में हर छोटी से बड़ी ज़रूरत और सहायता के लिए माता पिता पर निर्भर होते हैं, चाहे वह भावनात्मक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक ज़रूरत हो। उनके लिए, माता पिता उनकी आशा, प्रेम और सब कुछ होते हैं। इतना ही नहीं, नन्हे बच्चों को भी उनके माता - पिता की गोद में अधिक सुरक्षित महसूस होता हैं। लेकिन क्या होता है अगर वह ही बच्चा अपने माता पिता को खो देता है? सोचना भी दुखदाई है। वह टूट जाता है और उसे लगता है कि उसने आना सब कुछ खो दिया है। ऐसे में अगर इन बच्चों के अनाथ होने का कारण एचआईवी / एड्स होता है जिससे वह खुद भी ग्रसित होते हैं, तो स्तिथि और भी दैनीय हो जाती है। दुर्भाग्य से इस देश में सैकड़ों या हजारों नहीं बल्कि लाखों से भी ज्यादा ऐसे बच्चों हैं जिन्होंने एचआईवी / एड्स के चलते अपने माता पिता को खो दिया है और क्यूंकि उनकी देखभाल और प्यार के लिए कोई नहीं है, वह एक अनाथ की जिंदगी जीते हैं। एचआईवी / एड्स बच्चों को केवल व्यक्तिगत रूप से ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि उनके परिवारों और उनके देखभाल व स्नेह के अधिकार का हनन भी करता है। सहायता के बिना इन बच्चों के लिए स्वास्थ्य स्वच्छता या शिक्षा के कुछ माईने नहीं रहते और वे खुद को समाज में वापस एकीकृत करने का मतलब छोड़ देते हैं। सत्यकाम का मानना ​​है कि इन बच्चों को देखभाल और संरक्षण की सबसे अधिक जरूरत होती है। इसी सोच के साथ सत्यकाम का जन्म जनवरी 2004 में हुआ था। तबसे संस्था इस ओर कार्य कर रही है कि इन अनाथ, परित्यक्त, बेसहारा और HIV-affected बच्चों को उनके माता - पिता की कमी महसूस न हो। सत्यकाम ऐसे बच्चों के लिए खुद उनके अभिभावकों का काम करती है। वह तत्पर है इन बच्चों के चेहरों पे मुस्कान लाने के लिए। संस्था ने अपने कार्य की फल करते हुए एचआईवी / एड्स से पीड़ित बच्चों के लिए, जिन्होंने अपने अभिभावकों में से किसी एक को या दोनों को खो दिया हो, उनके लिए मेरठ में एक रेज़िदेन्शिअल केयर होम बनाया जिससे आप सभी लोग जुड़े हैं। यह केयर होम मेरठ का ही नहीं परन्तु उतर प्रदेश का पहले ऐसा केयर होम है जहाँ एचआईवी / एड्स वाले बच्चे रखे जाते हैं। यहाँ एक पूरे दिन के शिड्यूल के हिसाब से बच्चों के खानपान, रहन सहन, शिक्षा, वोकेशनल, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है जिससे उनका समग्र विकास हो सके। इस कार्य में आप सभी लोगों का हमेशा से ही हमे सहयोग मिलता रहा है। सत्यकाम के संस्थापक अजय शर्मा जी का कहना है कि ‘इस केयर होम की स्थापना करके, सत्यकाम टीम के साथ समाज से एचआईवी संक्रमित बच्चों के नकारात्मक भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में सफल रहे हैं। इस केयर होम कि पहल ने मेरठ शहर के समुदाय के बीच के साथ जी रहे बच्चों के प्रति ज्ञान और व्यवहार में परिवर्तन को बढ़ावा दिया है। इसके लिए सत्यकाम, मेरठ कि जनता का यानि आप सबका आभारी है कि आप सभी ने नियमित रूप से केयर होम आकार बच्चों को अपना प्यार दिया और उनकी ज़रूरतों का ख्याल भी रखा।’ केयर होम के साथ संस्था अपने ‘होम बेस्ड केयर सपोर्ट प्रोग्राम’ के माध्यम से ऐसे लोगों की मदद भी करती है जो अपने परिवार के साथ ही रहते हैं। उन्हें काउंसलिंग के साथ साथ ज़रुरी दवाइयां और सामान समय समय पर उनकी ज़रूरत के हिसाब से दिया जाता है। संगठन के सभी काम, समाज के समर्थन व सहयोग से किए जाते हैं। #NGO #HIV #AIDS #Children #Care #Human #Satyakam #Meerut
  • ngoaidindia
    Mar 31

    भारत बिजली बनाने और उसकी खपत करने वाला दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है मगर फिर भी भारत में ही लाखों लोग आज भी अंधेरे में जी रहे हैं। इसको एक बड़े व्यंग की तरह से देखा जा सकता है। एक सच्चा व्यंग। खैर, लोगों के इस अधेंरे को दूर करने के लिए तमाम सरकारें लगातार की बातें करती हैं और इसी कड़ी में अब लोग खुद भी जुड़ गए हैं। चिराग रुरल डेवलपमेंड फांउडेशन नाम के एनजीओ ने जिम्मा उठाया है कि वह भारत के दूर-दराज के अधेंरे में रहने वाले गावों तक रोशनी पहुंचाएगा। एनजीओ की संस्थापक प्रतिभा पाय का कहना है कि 2020 तक वह 15,000 गांव तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रहीं हैं जिससे लगभग 2 लाख लोगों का जीवन प्रभावित होगा। हाल ही में पाय के एनजीओ ने महाराष्ट्र में पालघार जिले के बालदयाचपाडा में बिजली पहुंचाने का काम पुरा किया है। यह उनके चिराग मिशन का 400वां गांव है। प्रतिभा पाय ने यह एनजीओ 2010 में शुरु किया था तब वह एच.आर. कॉलेज आफ कोमर्स एंड इकोनोमिक्स में पऱोफेस्सर थी और उन्होंने इसकी शुरुआत अपने विद्यार्थियों के साथ ही मिलकर की थी। इसकी शुरुआती सफलता ने उनके भीतर इसपर आगे काम करने का जज्बा पैदा कर दिया और एक साल बाद उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर सारा ध्यान इसी पर लगा दिया। इस एनजीरओ की शुरूआत की वजह पर पाय कहती हैं कि इस देश में ऐसे हजारों गांव हैं जहां के लोग आज भी अंधेरे में अपना जीवन बिता रहें हैं और हम इस ग्रामीण भारत में एक बदलाव लाना चाहते हैं। कैसी करती है गांव में रोशनी? कुछ वेबसाइट और समाचार माध्यमों को दिए गए साक्षात्कार में पाय ने बताया कि किस गांव में बिजली की कितनी कमी है और उसको कैसे पूरा करना है इसकी जानकारी सबसे पहले इकट्ठी की जाती है और फिर उसके हिसाब से एक प्लान तैयार किया जाता है। एक प्रोजेक्ट को करने में लाखों रुपये का खर्चा होता है जिसे एनजीओ प्राइवेट कंपनियों से लेने का प्रयास करता है। गांव वालों को सोलर पेनल बहुत ही कम दाम में दिया जाता है। गांव वालों से 300 से 500 रुपये लिए जाते है ताकि वह इसके प्रति सजग रहें और इसका इस्तेमाल के प्रति जागरुक होकर इसे लें। इसके उपयोग करने के विधि और फायदों के बारें में लोगों को बताता है।   पाय कहती हैं कि उनका एनजीओ न केवल बिजली, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ की समस्याओं का भी समाधान करने का यत्न कर रहा है। इस वक्त यह एनजीओ मेघालय, असम, उत्तरांचल, कर्नाटका, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में काम कर रहा है। #Ngo #Solar #Inspiring #Story #SolarEnergy #Development
  • ngoaidindia
    Nov 3, 2017

    जगह-जगह फैला कूड़ा, सड़क किनारों की दीवारें जिन पर पुते होते थे विज्ञापन, लगी होती थी पान की पीक, बदहाल पार्क जिनमे जाने की बजाये बच्चे बाहर खेलना पसंद करते थे और जो सिर्फ कालोनी का कूड़ाघर बन कर रह गये थे। इन सबको देखना और सहन करना एक इंसान के लिये मुश्किल था। मन में थी हालात बदलने और शहर को स्वच्छ करने की कसमसाहट। एक दिन वह अपने चंद साथियों के साथ निकल पड़ा शहर की बदहाल सूरते को बदलने के लिये। ‘नेक नीयत, मंजिल आसान’ अंगुली पर गिने जाने वाले साथियों  का कारवां बढ़ता गया और राहे मंजिल आसान होती चली गयी। उस इंसान की इस छोटी सी 'पहल' का कार्य लोगों के लिये प्रेरणा बना तो खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में तीन बार इसकी खुलकर प्रशंसा कर चुके हैं। आज दूसरे राज्यों की सरकारें भी उन्हें बुला रही हैं कि वो उनके राज्यों की गंदी हो चुकी सूरत को बदलने में सहयोग करें। हम बात कर रहे हैं मेरठ के प्रसिद्ध चिकित्सक डा. विश्वजीत बैंबी की जो अपने शहर की बदहाल हालत को देखकर हमेशा चिंतित रहते थे। एक दिन उन्होंने इसमे बदलाव लाने की ठानी और अपने साथी चिकित्सक, इंजीनियर्स, बुद्धिजीवी और चंद बच्चों को लेकर एक पहल की। 26 जनवरी 2014 से 'पहल एक प्रयास' ने स्वच्छता अभियान की शुरूआत की। हाथों में झाडू, फावड़े, दीवारों पर पोतने के लिये रंग लिये कुछ लोग निकल पड़े शहर को साफ करने। ‘मै अकेला ही निकला था सरेराह लेकिन, लोग मिलते गये कारवां बढ़ता गया’। डा. विश्वजीत बैंबी के इस प्रयास की हर किसी ने प्रशंसा की और लोगों के संस्था से खुद-ब-खुद जुड़ने का सिलसिला शुरू हो गया। । संस्था ने 15 जून 2014 में अपना रजिस्ट्रेशन कराया और अब उन्हें कार्य करते हुए तीन साल से अधिक हो गये हैं।  सामाजिक संस्था 'पहल एक प्रयास’ में डॉक्टर्स, इंजीनियर और बहुत से बुद्धिजीवी के साथ-साथ बच्चे भी जुड़े हैं। ये सभी छुट्टी के दिन किसी एक क्षेत्र को चुनकर सफाई अभियान चलाते हैं। उनके प्रयास सफल होते गये और कूड़ाघर बन चुके बदहाल पार्कों में बच्चे खेलने लगे, पान की पीकों और गंदगी से सराबोर दीवारों पर सुंदर कलाकृतियां दिखने लगीं। चौराहे आज अपनी सुंदरता से सबको आकर्षित कर रहे हैं। आज पहल एक प्रयास से बड़ी संख्या में डाक्टर्स, इंजीनियर्स, बुद्धिजीवियों से लेकर बच्चे-बुजुर्ग तक जुड़ चुके हैं और शहर को स्वच्छ बनाने के प्रयास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। उनके सराहनीय कार्यों को देखते हुए हरियाणा सरकार ने भी उन्हें अपने यहां आमंत्रित किया ताकि वह हरियाणा के लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक कर सकें। डा. विश्वजीत बैंबी दो बार कुरूक्षेत्र की यूनिवर्सिटी में प्रजेंटेशन देकर लोगों को जागरूक कर चुके हैं। डॉ. विश्वजीत के अनुसार पीएम नरेंद्र मोदी अपने कार्यक्रम मन की बात में तीन बार पहल एक प्रयास के कार्यों को सराह चुके हैं। डा.विश्वजीत बैंबी का कहना है कि उनके स्वच्छता अभियान में आम आदमी के सहयोग और जागरूकता की बेहद आवश्यकता है। एक बार इलाके में सफाई हो जाने के बाद यह वहां के लोगों की जिम्मेदारी है कि वो उस जगह की सुंदर और स्वच्छ बनाये रखें। वहीं प्रशासन भी स्वच्छ दीवारों पर पोस्टर चिपकाने, वॉल पेंटिंग करने और गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे तो ‘पहल एक प्रयास का’ उद्देश्य सार्थक हो सकेगा।  #inspiring #Story #Clean #Meerut #MannKiBaat #ManKiBaat #PMModi #Modi #CMYogi #Doctor #NGO #PahalEkPrayas